अमला योग
परिभाषा – (1) चन्द्रमा जिस राशि पर बैठा हो, उससे दसवें स्थान पर यदि शुभ ग्रह बैठा हो तो अमला योग होता है।
(2) यदि लग्न से दसवें स्थान पर शुभ ग्रह हो तो भी अमला योग माना जाता है ।
फल – जिस जातक की कुण्डली में अमला योग होता है, वह प्रसिद्ध, गुणवान और ख्याति प्राप्त करने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति पूर्ण सुखी जीवन बिताता एवं सम्पूर्ण सुखों को भोगता है। ऐसा व्यक्ति चरित्रवान एवं सज्जन होता है ।
चन्द्रमा की ही तरह यदि किसी जातक की कुण्डली में लग्न स्थान से दसवें भाव पर शुभ ग्रह हो तो वहाँ भी अमला योग होता है ।
दसवें भाव पर जो ग्रह स्थित होता है, उस ग्रह की दशा में जातक को विशेष धन प्राप्त होता है। व्यापारी हो तो उसका व्यापार फैलता है, राजकीय सेवा में हो तो उच्च पद प्राप्त करता है और इस प्रकार धन एवं ख्याति दोनों एक साथ प्राप्त करता है ।
ज्योतिष के पाठकों को चाहिए कि वे किसी भी कुण्डली का अध्ययन करने से पूर्व उसमें निहित योगों का पता लगाकर तदनुसार ही फलाफल
कहें ।
पर्वत योग
(1) केंद्र में शुभ ग्रह विद्यमान हों, छठा और आठवां स्थान या तो खाली हो या फिर शुभ ग्रहों से युक्त हो तो इस प्रकार होने वाला पर्वत योग होता है ।
(2) लग्नेश ओर व्ययेश यदि परस्पर केन्द्र में स्थित हों तथा दोनों मित्र ग्रहों से दृष्ट हों तो पर्वत योग होता है।
फल – पर्वत योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपने उच्च भाग्य का स्वयं निर्माता होता है तथा जीवन में उसे सदैव भाग्य साथ देता है। विद्या के क्षेत्र में ऐसा जातक बहुत उन्नति करता है एवं गरीबों, पीड़ितों एवं अनाथों की सहायता करने में तत्पर रहता है।
परन्तु ऐसा व्यक्ति भोगी भी होता है एवं उसके जीवन में कई रमणियाँ प्रेमिकाओं के रूप में आती हैं, जिनसे वह आनन्द सुख प्राप्त करता है। उसकी सर्वत्र ख्याति होती है । ऐसा जातक सरपंच, म्युनिसिपल कमिश्नर या जिला बोर्ड का सदस्य बन जाता है। यद्यपि यह योग जातक को राजनीति में दक्ष नहीं करता और ना ही उसे सफल राजनीतिज्ञ बनाता है परन्तु यह योग रखने वाला जातक आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न एवं खुशहाल होता है।
बुध योग
परिभाषा – लग्न में वृहस्पति हों, बृहस्पति से केन्द्र में चन्द्रमा हो तथा चन्द्रमा से दूसरे स्थान पर राहु पड़ा हो तथा राहु से तीसरे भाव पर सूर्य और मंगल हो तो बुध योग होता है।
फल – बुध योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति बहुत धनवान होता उसके जीवन में धन का अभाव नहीं होता । वह स्वयं शक्तिशाली होता है एवं स्वस्थ तथा बलिष्ठ शरीर धारण करता है।
देश-विदेश में उसके कार्यों को प्रशंसा होती है तथा उन कार्यों के माध्यम से वह ख्याति लाभ भी करता है । शास्त्र वगैरह का जानकार होता है तथा शीघ्र निर्णय लेने में भी वह सक्षम होता है। वैज्ञानिक विषयों में रुचि रखता है तथा प्रसिद्ध वैज्ञानिक बनता है ।
शत्रुओं का संहार करने वाला, बुद्धिमान तथा चतुर होने के साथ-साथ यदि जातक व्यापार करता हो तो विदेशों में उसका व्यापार फैलता है ।
टिप्पणी – इस योग के लिए यह आवश्यक है कि लग्न में गुरु हो तथा गुरु से केन्द्र में चन्द्र हो । इस प्रकारु गुरु, चन्द्र मिलकर गजकेशरी योग तो बना ही देते हैं। स्पष्टत यह योग भी राज योग के ही सदृश है ।
मरुत् योग
परिभाषा – शुक्र से 5वें या 9वें स्थान पर गुरु हो, गुरु से 5वें स्थान पर चन्द्रमा हो तथा चन्द्रमा से केन्द्र में सूर्य हो तो मरुत योग होता है।
फल – इस योग में उत्पन्न होने वाला व्यक्ति बातचीत करने की कला में पटु होता है, उसका हृदय विशाल तथा दूसरों की सहायता करने को सदा तत्पर रहता है। आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न और सुखी, शारीरिक दृष्टि से स्थूलकाय तथा एक सफल व्यापारी होता है, जो अपने प्रयत्नों से व्यापार को चतुर्दिक फैला देता है । ज्ञानवान, तुरन्त निर्णय लेने की शक्ति और सही समय को पहचानने की क्षमता, उसके विशिष्ट गुण होते हैं ।
मरुत् योग में चार ग्रह मुख्य हैं । बृहस्पति, शुक्र तथा चन्द्र तो परस्पर त्रिकोण में हों तथा सूर्य केन्द्र में हो । ज्योतिष के विद्यार्थियों को चाहिए कि वे इस प्रकार के योगों का सूक्ष्मतापूर्वक अध्ययन कर सही निर्णय लेने की क्षमता उत्पन्न करें ।
इन्द्र योग
परिभाषा – यदि चन्द्रमा से तीसरे स्थान पर मंगल हो, मंगल से सप्तम भाव में शनि हो, शनि से सातवें भाव में शुक्र हो और शुक्र से सातवें भाव में गुरु हो तो इन्द्र योग होता है ।
फल – इन्द्र योग रखने वाला व्यक्ति प्रसिद्ध वीर और रणनीतिज्ञ होता है तथा युद्ध में प्रसिद्धि प्राप्त कर ख्याति लाभ करता है। वह स्वयं राजा होता है अथवा राजा के तुल्य जीवन बिताता है । बातचीत में होशियार, गुणी एवं सरल स्वभाव का होता है तथा 38 वर्ष तक जीवित रहता है।
टिप्पणी – यह योग राज योग की ही तरह है। इस योग में जन्म लेने वाले जातक की आयु अधिक नहीं होती, परन्तु अल्पायु में ही वह प्रसिद्धि प्राप्त कर अपना नाम चतुर्दिक फैला देता है। जीवन में इसे किसी भी प्रकार का अभाव नहीं रहता ।
कुछ विद्वानों ने इन्द्र योग की परिभाषा दूसरे प्रकार से भी दी है । उनके अनुसार चन्द्रमा लग्न से पाँचवें स्थान पर हो तथा पाँचवें भाव का स्वामी एकादश भाव में और एकादश भाव का स्वामी पाँचवें भाव में हो तो इन्द्र योग बन जाता है ।
परन्तु मुझे इस प्रकार के ग्रह सम्बन्धों से इन्द्र योग बनने एवं तदनुसार फल में सन्देह है ।
भास्कर योग
परिभाषा – यदि सूर्य से दूसरे भाव में बुध हो, बुध से ग्यारहवें भाव में चन्द्रमा हो तथा चन्द्रमा से 5वें या 9वें भाव में बृहस्पति हो तो भास्कर योग बनता है ।
फल – भास्कर योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अत्यन्त धनी होता है तथा निरन्तर अर्थ-संचय में प्रवृत्त रहता है। कई प्रकार के शास्त्रों को जानने वाला तथा कई विद्याओं में निष्णात् होकर शारीरिक रूप से बलशाली तथा शत्रुहन्ता होता है।
ऐसा व्यक्ति संगीतादि कलाओं में रुचि रखने वाला होता है। या तो वह स्वयं कवि होता है अथवा कवियों, संगीतज्ञों एवं चित्रकारों की भरपूर सहायता करने वाला होता है। उसके पास चुम्बकीय व्यक्तित्व होता है तथा जीवन में मित्रों की संख्या निरन्तर बढ़ती रहती है।
टिप्पणी – इस योग में ग्रह – बुध, सूर्य, चन्द्र चाहे नीचांश में हों या पापराशिस्थ हों, फल में कोई अन्तर नहीं आता ।
चतुस्सागर योग
परिभाषा – सभी शुभ ग्रह और पाप ग्रह (सम्पूर्ण ग्रह) केन्द्र स्थानों में हों तो चतुस्सागर योग होता है।
फल – इस योग वाले जातक प्रसिद्ध होते हैं तथा पूर्ण नेता होते हैं। ये व्यक्ति दीर्घजीवी, स्वस्थ एवं हृष्ट-पुष्ट होते हैं। ऐसा व्यक्ति खूब विदेश यात्राएँ करता है तथा समुद्र पार कर ख्याति लाभ करता है। नौकरी भी ऐसी होती है जिसमें भ्रमण कार्य विशेष रहता है । पारिवारिक दृष्टि से ये जातक सफल होते हैं ।
टिप्पणी – राहु और केतु ग्रहों में शामिल न कर शेष सातों ग्रह सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि-केन्द्र स्थानों (1, 4, 7, 10) में होने पर यह योग बन जाता है। ऐसा व्यक्ति यात्राएँ करने का शौकीन होता है तथा इसी के माध्यम से यश लाभ करता है ।
परश्चस्सागर योग
परिभाषा – यदि कुण्डली में सभी ग्रह मेष, कर्क, तुला और मकर राशियों में स्थित हों तो परश्चतुस्सागर योग होता है।
फल – यह योग प्रबल अनिष्टनाशक है। कुण्डली चाहे कितनी ही दरिद्र हो, पर यह योग रखने वाला जातक उच्च पद प्राप्त करता है तथा सेक्रेटरी या उच्च स्तर का मन्त्री पद प्राप्त करता है । कुण्डली के सभी अनिष्टों का नाश करता हुआ जातक को उच्च शिखर की ओर ले जाने में ओर ले जाने में यह योग सक्षम होता है ।
टिप्पणी – चतुस्सागर योग और परश्चतुस्सागर योग में अंतर यह है कि चतुस्सागर योग में सभी ग्रह केन्द्र स्थानों में होने चाहियें, चाहे केन्द्र स्थानों की राशियाँ कोई भी हों पर इस योग में राशियों पर विशेष बल दिया गया है । इस योग में इतनी ही आवश्यकता है कि सभी ग्रह मेष, कर्क, तुला और मकर राशियों में ही हों, फिर चाहे ये राशियाँ केन्द्र में हों या कहीं और हों । दोनों ही योगों में जातक को पूर्ण वाहन सुख प्राप्त होता है ।
वसुमति योग
परिभाषा – लग्न से 3, 6, 10 और 11वें स्थानों में शुभ ग्रह हों तो वसुमति योग बनता है।
फल – ऐसा जातक पूर्ण धन सुख भोगता है एवं जीवन में धन का अभाव नहीं रहता तथा स्वयं के बाहुबल से भाग्य को अपने पक्ष में करने में समर्थ होता है ।
टिप्पणी – वसुमति योग में यह आवश्यक है कि स्थानों की गणना लग्न से की जाय एवं लग्न से उपचय स्थान (3, 6, 10, 11) शुभ ग्रहों से युक्त हों, पर कुछ विद्वान लग्न को मुख्य न मान कर चन्द्र को मुख्य मानते हैं, उनके अनुसार चन्द्र से उपचय स्थान शुभ ग्रहों से मुक्त होने चाहिए।
पर व्यवहारिक रूप में मुझे जो कुण्डलियाँ देखने को मिलीं, उनमें चन्द्रमा को मुख्य मानकर स्थानों की गणना से फल पूर्ण रूप से सही नहीं उतरता, इसके विपरीत लग्न से गणना कर जो वसुमति योग बनता है, वह पूर्ण फलदाता सिद्ध हुआ । अतः मेरी राय में लग्न से गणना करना अधिक उचित प्रतीत होता है।
गंधर्व योग
परिभाषा – लग्न स्थान शुक्र का घर हो और लग्न से केन्द्र में शुक्र और गुरु हों तो गंधर्व योग होता है ।
फल – गंधर्व योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति प्रसिद्ध गीतकार अथवा गायक होता है तथा उसके संगीत से मनुष्यों का चित्त खिल उठता है । ऐसा व्यक्ति ख्याति लाभ करता है एवं विदेश यात्रा भी करता है।
मुनि योग
परिभाषा – गुरु और शनि एक ही अंशों के हों तथा दोनों नवम या दशम भाव में एक साथ बैठे हों एवं शुभ ग्रहों से दृष्ट हों तो मुनि योग बनता है ।
फल – मुनि योग में उत्पन्न होने वाला व्यक्ति सांसारिक प्रपंचों से दूर हटकर उम्र भर के लिए साधु बन जाता है एवं मुनि का जीवन व्यतीत करता है ।
टिप्पणी – यह योग व्यक्ति को एक कुशल सामाजिक नहीं बनने देता और न ही उसे परिवार का सुख प्राप्त होता है । बाल्यावस्था से ही व्यक्ति वीतरागी और साधु स्वभाव हो जाता है तथा एकान्त में रहना अधिक पसन्द करता है। साधुवत् जीवन ही इसका चरम उद्देश्य बन जाता है तथा मुनि जीवन में रहकर जातक प्रसिद्धि प्राप्त करता है ।
काहल योग
परिभाषा – (1) नवम भाव का स्वामी और चतुर्थ भाव का स्वामी परस्पर केन्द्र में हों और लग्नेश बलवान हो तो काहल योग होता है ।
(2) चौथे भाव का स्वामी अपने उच्च, नीच या स्वराशि पर हो एवं दशम भाव के स्वामी के साथ बैठा हो या देखा जाता हो तो काहल योग होता है।
फल – काहल योग में उत्पन्न जातक बलिष्ठ शरीर, वीर और दृढ़ चरित्र का व्यक्ति होता है। साहसिक कार्यों में इसकी प्रवृत्ति खूब रमती है तथा मिलिटरी या स्थल सेना में उच्च पद प्राप्त करता है। जीवन में यह जातक सभी सुखों को भोगता है, परन्तु ऐसा व्यक्ति मूर्ख भी होता है तथा मूर्खता के ही कारण अथवा स्वयं की असफल नीति के कारण ही उसका पतन होता है ।
आधुनिक युग में इस योग को रखने वाला जातक सुखी नहीं रह सकता और न इस प्रकार की प्रवृत्ति ही आधुनिक युग में मान्य है । फिर भी यदि किसी जातक की कुण्डली में यह योग हो तो उसे यह सलाह देनी चाहिए कि वह सेना में भर्ती हो जाय, जहाँ उसके उन्नति करने के अवसर आते रहते हैं ।
यदि यह योग बलिष्ठ हो, साथ ही कुण्डली में राजयोग भी हो तो व्यक्ति कलेक्टर बन सकता है। कुंभ लग्न वाली कुण्डली में यह योग ज्यादा प्रभावशाली माना गया है ।
महाभाग्य योग
परिभाषा – पुरुष की कुण्डली हो और दिन का जन्म हो तथा सूर्य, चन्द्र और लग्न आयुग्म राशियों (1, 3, 5, 7, 9 व 11) में हों ।
इसी प्रकार स्त्री की कुण्डली हो और रात्रि का जन्म हो तथा सूर्य, चन्द्र और लग्न युग्म राशियों ( 2, 4, 6, 10, 12) पर हों तो महाभाग्य योग होता है ।
फल – इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति उत्तम चरित्र एवं पवित्र विचारों का धनी जातक होता है तथा जितने भी व्यक्ति उसके संपर्क में आते हैं, वे प्रसन्न रहते हैं। मित्रों का इसके जीवन में अभाव नहीं रहता। ऐसा व्यक्ति पूर्ण आयु प्राप्त करता है । वृद्धत्वकाल पूर्ण सुख से बीतता है तथा ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में स्वयं के कार्यों के फलस्वरूप प्रसिद्धि प्राप्त करता है ।
स्त्री जातक की कुण्डली में यह योग होने से वह उत्तम पुरुष के साथ ब्याही जाती है तथा जीवन में धन का अभाव नहीं रहता। ऐसी स्त्री आदर्श महिला कही जा सकती है।
टिप्पणी – महाभाग्य योग रखने वाला जातक उत्तम कोटि का भाग्य अपने साथ लेकर आता है। लग्न, सूर्य और चन्द्र तीनों मन, बुद्धि और शरीर के कारक हैं और जब ये तीनों तत्व बलिष्ठ हो जाते हैं तो निश्चित ही आदमी भाग्यशाली हो जाता है।
पुष्कल योग
परिभाषा – लग्नेश बलवान हो तथा राशि के स्वामी चन्द्रमा के साथ होकर केन्द्र में स्थित हो या मित्र के घर में स्थित हो तो ही पुष्कल योग बनता है।
फल – पुष्कल योग वाला व्यक्ति धनवान भी होता है तथा मित्रों से पूर्ण सहायता भी प्राप्त करता है। नौकरी में ऐसा व्यक्ति अत्यधिक उन्नति करता है, अपने से उच्च अधिकारियों का वह प्रिय पात्र होता है तथा मधुरभाषी एवं प्रसिद्ध जातक होता है।
टिप्पणी – इस योग में लग्नेश (लग्न भाव का स्वामी) बली हो अर्थात् 20 से 25 अंशों के बीच हो, साथ ही चन्द्रमा भी बलवान हो, तभी यह योग पूर्ण फल देता है।
चामर योग
परिभाषा – (1) लग्न का स्वामी अपनी उच्च राशि का होकर केन्द्र में स्थित हो तथा गुरु उसे देखता हो तो चामर योग कहलाता है ।
(2) यदि लग्न में या सप्तम स्थान में या नवम अथवा दशम स्थान में दो शुभ ग्रह हों तो भी चामर योग कहलाता है ।
फल – चामर योग में उत्पन्न मनुष्य उच्च, पूर्ण प्रतिष्ठित एवं राज्यमान्य व्यक्तियों के द्वारा पूजा जाता है तथा स्वयं वह विद्वान होता है । वेद शास्त्रों का ज्ञाता तथा पूर्ण आयु प्राप्त करता है । हिम्मत, विक्रम और अपने कार्यों के द्वारा वह प्रसिद्धि प्राप्त करता है ।
टिप्पणी – पूर्ण आयु से तात्पर्य 70 से 100 साल के बीच की उम्र भोगता है तथा जीवन में सफलता प्राप्त करता है ।
वीर योग
परिभाषा – तीसरे भाव में कोई भी दो पाप ग्रह और एक सौम्य ग्रह हो तथा उसे चन्द्र देखता हो तो वीर योग होता है ।
फल – इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति पुलिस या मिलिटरी क्षेत्र में उच्च पद प्राप्त करता है तथा प्रसिद्ध होता है ।
टिप्पणी – तीसरा भाव वीरता आदि कार्यों से ही संबंध रखता है । उसमें दो पाप ग्रह होने से, जातक बलिष्ठ, पराक्रमी और वीर भावनाओं से पूरित व्यक्ति होगा ही, साथ ही एक सौम्य ग्रह होने से वह उसकी ताकत का दुष्प्रयोग नहीं होने देगा, साथ ही चन्द्रमा की दृष्टि उसे सही रास्ते पर ले जाने के साथ-साथ हृदय से भी मजबूत बना देगी ।
शंख योग
परिभाषा – (1) पाँचवें भाव का स्वामी और छठे भाव का स्वामी परस्पर केन्द्र में स्थित हों तथा लग्नेश बलवान हो तो शंख योग होता है।
(2) लग्नेश और दशमेश चर राशि में हों एवं भाग्येश बली हो तो शंख योग होता है ।
फल – शंख योग में उत्पन्न जातक आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाला होता है, दूसरों के प्रति उसका व्यवहार मधुर और सौम्य होता है तथा पारिवारिक दृष्टि से वह सफल व्यक्ति होता है । ऐसा जातक विज्ञान, धर्म, शास्त्रादि में पूर्ण रुचि रखता है तथा पूर्ण आयु प्राप्त करता है ।
शंख योग रखने वाला व्यक्ति अपने कार्यों से देश-विदेश में यश तथा ख्याति प्राप्त करता है तथा सर्वत्र पूजा जाता है ।
लक्ष्मी योग
परिभाषा – यदि भाग्येश (नवम भाव का स्वामी) अपनी उच्च राशि में या मूलत्रिकोण या स्वराशि का होकर केंद्र में स्थित हो तथा लग्नेश बलवान हो तो लक्ष्मी योग होता है।
फल – जातक पूर्ण सम्पन्न एवम धनवान होता है। अपने बाहुबल से वह पृथ्वी को जीतता है तथा युद्ध में ख्याति प्राप्त करता है । ऐसे व्यक्ति में भाषण देने की अद्भुत शक्ति होती है तथा लोगों को अपने पक्ष में करने की कला में माहिर होता है। गुणी, चतुर, योग्य, संकटों में भी स्थिर चित्त रहने वाला तथा ख्याति प्राप्त व्यक्ति होता है ।

नमस्कार । मेरा नाम अजय शर्मा है। मैं इस ब्लाग का लेखक और ज्योतिष विशेषज्ञ हूँ । अगर आप अपनी जन्मपत्री मुझे दिखाना चाहते हैं या कोई परामर्श चाहते है तो मुझे मेरे मोबाईल नम्बर (+91) 7234 92 3855 पर सम्पर्क कर सकते हैं। धन्यवाद ।
टिप्पणी – लक्ष्मी योग में नवम भाव के स्वामी को ही अधिक महत्व दिया जाता है, क्योंकि वह भाग्य की वृद्धि में तो सहायक होता ही है साथ ही केन्द्र में पड़ कर ख्याति भी प्रदान कर देता है। इसके अतिरिक्त नवम भाव की तृतीय स्थान पर भी दृष्टि रहती है, फलस्वरूप जातक बाहुबल में भी ताकतवर और संघर्षों में अविचलित होने वाला हो जाता है ।
कुछ विद्वानों ने इसके अतिरिक्त भी निम्न योगों को लक्ष्मी योग के नाम से संबोधित किया है ।
(1) नवम भाव का स्वामी लग्न में हो और लग्नेश नवम भाव में हो । (2) नवमेश केन्द्र या त्रिकोण में हो तथा लग्न स्थान पर दृष्टि रखता हो ।
(3) लग्नेश और शुक्र अपनी-अपनी राशि में हों या उच्च राशि पर स्थित हों ।
स्पष्टतः ये तीनों भी लक्ष्मी योग कहे जा सकते हैं पर ये साधारण कोटि के ही योग हैं। शुक्र, नवमेश और लग्नेश ही धनकारक ग्रह माने जाते हैं।
महालक्ष्मी योग
परिभाषा – लग्नेश त्रिकोण में हो, द्वितीयेश एकादश भाव में हो तथा द्वितीय स्थान पर उसके ही स्वामी की दृष्टि हो या शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो महालक्ष्मी योग होता है ।
फल – महालक्ष्मी योग रखने वाला जातक अटूट सम्पत्ति का स्वामी होता है तथा उसे द्रव्य की कभी भी कमी नहीं होती है।
टिप्पणी – दूसरा घर धन स्थान का है तथा ग्यारहवाँ भाव आय का है, इन दोनों का परस्पर संबंध होने तथा लग्नेश के बलवान होने से अटूट सम्पत्ति रहती है। साथ ही यदि एकादश भाव में रह कर ग्रह दूसरे भाव को, जो कि उसका स्वग्रह या उच्च ग्रह हो, देख ले तो निश्चय ही महालक्ष्मी योग बन जाता है।
इस प्रकार कुण्डली में महालक्ष्मी योग होने से संबंधित जातक पूर्ण धनी एवं देश-विदेश में ख्याति प्राप्त व्यक्ति होता है।
भारती योग
परिभाषा – नवांश का स्वामी दूसरे भाव के, पाँचवें भाव के या एकादश भाव के स्वामी से देखा जाता हो तथा नवमेश के साथ बैठा हो तो भारती योग होता है।
फल – भारती योग में उत्पन्न व्यक्ति कमल के समान नेत्र वाला, गुणवान, चतुर, विद्यावान, संगीतादि कलाओं में निपुण तथा प्रसिद्धि प्राप्त होता है ।
टिप्पणी – भारती योग नवमांश कुण्डली से देखा जाता है। नवमांश कुण्डली से तात्पर्य है जन्म कुण्डली का नवाँ हिस्सा तथा उसी गणित से स्थापित हुए ग्रह एवं भाव जो कि नवमांश कुण्डली कही जाती है ।
सरस्वती योग
परिभाषा – गुरु, चन्द्रमा के घर में तथा चन्द्रमा गुरु के घर में हो एवं चन्द्रमा पर गुरु की दृष्टि भी हो तो सरस्वती योग माना जाता है ।
फल – सरस्वती योग रखने वाला व्यक्ति अत्यन्त प्रसिद्ध होता है तथा सरस्वती का वरद पुत्र माना जाता है । काव्य, संगीतादि क्षेत्र में वह उच्च कोटि की रुचि रखने वाला होता है । अपनी कला से वह देश और विदेश सर्वत्र प्रसिद्धि प्राप्त करता है ।
इस प्रकार के व्यक्ति पर लक्ष्मी की भी पूर्ण कृपा होती है । वह मन से भावुक होता है तथा दूसरे की सहायता करने को सदैव तत्पर रहता है ।
टिप्पणी – सरस्वती (विद्या) के कारक ग्रह केवल चन्द्रमा और बृहस्पति ही हैं । चन्द्र मन का एवं कल्पना तथा विचारों का स्वामी होता है तथा गुरु बुद्धि का । एक हृदयपक्ष का प्रतिनिधित्व करता है तो दूसरा बुद्धि पक्ष का । इस प्रकार हृदय एवं बुद्धि के सुखद सम्मिश्रण से जातक उच्चकोटि का कल्पनाशील कवि अथवा चित्रकार हो जाता है तथा अपनी कला के द्वारा देश-विदेश में ख्याति अर्जित करता है ।
नृप योग
परिभाषा – (1) तीन या इससे अधिक ग्रह कुण्डली में स्वराशि के हों या उच्च राशि के हों तो नृप योग होता है ।
(2) दो, तीन या चार ग्रह दिग्वल में हों तो नृप योग होता है।
(3) तीन या इससे अधिक ग्रह दशम भाव में हों तो नृप योग होता है।
फल – नृप योग में उत्पन्न व्यक्ति उच्च शासकीय अधिकारी होता है तथा जीवन के समस्त भोगों को सुखपूर्वक भोगता है ।
टिप्पणी – उपर्युक्त तीनों योग परीक्षित हैं और किसी भी जातक की कुण्डली में उपर्युक्त योगों में से कोई एक योग हो तो वह निस्सन्देह मंत्री पद प्राप्त करता है ।
क्रमांक 1 योग साधारण है जिसके विवेचन की आवश्यकता नहीं। यदि किसी की कुंडली में कहीं पर बैठ कर तीन ग्रह उच्च के हों या स्वराशिस्थ हों तो जातक की कुण्डली में नृप योग होता है और वह व्यक्ति उच्च शासकीय पद (सेक्रेटरी) या मंत्री पद प्राप्त करता है ।
क्रमांक 2 का नृप योग भी विवेचन की आवश्यकता रखता है । दिग्बल ग्रह निम्न राशियों पर निम्न ग्रह स्थित होने से होते हैं ।
- लग्न में बुध या गुरु होने से ये दोनों ग्रह दिग्बली कहलाते हैं ।
- मंगल और सूर्य दशम भाव में पड़कर दिग्बली होते हैं ।
- शनि सातवें भाव में होने से दिग्बली होता है ।
- शुक्र और चन्द्रमा चौथे भाव में होने पर दिग्बली होते हैं ।
क्रमांक 3 नृप योग तो सरल है, जिसे समझने की विशेष आवश्यकता नहीं ।
कोई भी तीन ग्रह बलवान और अच्छे अंशों में (10 से 20) हों तो जातक निश्चय ही मंत्री पद प्राप्त करता है, परन्तु उन तीनों ग्रहों में से एक भी ग्रह यदि नीच का या क्षीण अंशों का अथवा निर्बल होगा तो वह जातक को उच्च पद तो प्राप्त करायेगा पर वह पद स्थायी नही रहेग, अपितु उस पद के सम्बंध में काफी उतार चढाव देखने पडेंगे ।
राज्य योग
(1) जिसके जन्म समय 3, 4, 5 भावों में सब ग्रह हों तो राज्य योग होता है।
(2) जिस मनुष्य के जन्म समय में 3 ग्रह 3, 4, 5 भावों में हों, 2 ग्रह 2 तथा 9वें भाव में हों तथा शेष दो ग्रह लग्न और सप्तम भाव में हों तो राज्य योग होता है।
(3) सभी शुभ ग्रह नवें और ग्यारहवें भाव में हों तथा सभी पाप ग्रह छठे और दसवें भाव में हों तो राज्य योग होता है ।
(4) सभी ग्रह चन्द्रमा की होरा में हों तो राज्य योग होता।
(5) जिसके जन्म समय में बलवान शुभ ग्रह लग्न, सप्तम और दशम भाव में हों तथा मंगल नवम भाव में एवं शनि एकादश भाव में हो तो प्रबल राज्य योग होता है।
फल – राज्य योग में उत्पन्न जातक सभी सुख-सुविधाओं से पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं तथा उच्च कोटि का वाहन सुख प्राप्त करते हैं। ऐसा व्यक्ति चतुर, संकटों में भी स्थिरचित्त रहने वाला तथा उच्च कोटि का प्रशासकीय अधिकारी अथवा मंत्री होता है।
टिप्पणी – तीसरा स्थान पराक्रम, बल और साहस का होता है । चौथा स्थान सुख एवं आनन्द भोग का है एवं पाँचवाँ भाव विद्या, गुण कीर्ति आदि से संबंधित है। तीनों में ग्रह रहने से इन तानों भावों का परस्पर संबंध बन जाता है। फलस्वरूप जातक विद्यावान, गुणी, चतुर एवं बल व साहस से युक्त होकर पूर्ण सुखोपभोग करता है तथा नृपवत् जीवन व्यतीत करता है।
1
क्रमांक 2 राज्य योग में यह आवश्यक है कि सभी ग्रह 1, 2, 3, 4, 5, 7, 9वें भावों में स्थित हों एवं इसके अतिरिक्त किसी भी अन्य भाव में कोई ग्रह न हो तो राज्य योग हो जाता है ।
क्रमांक 3 में शुभ ग्रहों से तात्पर्य है – चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र तथा पाप ग्रहों से तात्पर्य है – सूर्य, भौम तथा शनि । राहु और केतु छाया ग्रह कहलाते हैं।
कुण्डली में चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र 9वें या 11वें भाव में हों तथा सूर्य, मंगल और शनि छठे तथा दसवें भाव में हों तो पूर्ण राज्य योग हो जाता है।
क्रमांक 4 जन्मपत्री में कुण्डली, चन्द्र कुण्डली, चलित चक्र और भाव स्पष्ट करने के पश्चात ही होरा चक्र स्पष्ट होता है। होरा चक्र में सूर्य तथा चन्द्रमा दो ग्रहों की होरा होती है। यदि सभी ग्रह केवल चन्द्र की होरा में ही हों तो राज्य योग होता है
महेन्द्र योग
परिभाषा – (1) चन्द्रमा लग्न में हो, गुरु चौथे स्थान में, शुक्र 10वें स्थान में तथा शनि स्वराशि का होकर कुण्डली में स्थित हो तो महेन्द्र योग होता है ।
(2) लग्न राशि का स्वामी सौम्य ग्रह हो तथा उच्च राशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र में हो तो महेन्द्र योग बनता है ।
(3) जिसके जन्म समय में लग्न या चन्द्रमा वर्गोत्तमांश में हों उसे चन्द्रमा को छोड़कर चतुर्थ, दशम, सप्तम स्थान में प्राप्त सभी ग्रह देखते हों तो महेन्द्र योग होता है ।
फल – जिस जातक की कुण्डली में महेन्द्र योग होता है, वह राजा या राजा के तुल्य होता है तथा जीवन में उसकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
टिप्पणी – क्रमांक 1 के महेन्द्र योग की परिभाषा स्पष्ट है, जिसके विवेचन की आवश्यकता नहीं। इसमें चन्द्र, गुरु और शुक्र के तो स्थान निर्धारित कर दिए हैं, पर शनि के लिए यह छूट है कि वह कुण्डली में किसी भी स्थान पर हो, पर इतना आवश्यक है कि शनि मकर या कुम्भ राशि का ही हो ।
क्रमांक 2 के योग में यह ध्यान रखने की बात है कि कुण्डली में जिस राशि पर चन्द्रमा बैठा होता है, वही राशि उस जातक की होती है। राशि का स्वामी सौम्य ग्रह – चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र ही हो । यह तभी सम्भव है कि जब चन्द्रमा कर्क, मिथुन, कन्या, धनु, मीन, बुध और तुला राशि पर हो। साथ ही चन्द्रमा जिस राशि पर बैठा हो, उसका स्वामी अपनी उच्च राशि पर स्थित होकर केन्द्र स्थान में स्थित हो तभी यह योग लागू होता है।
क्रमांक 3 में वर्गोत्तमांश ग्रह ध्यान देने योग्य हैं। कोई भी ग्रह वर्गोत्तमांश तब होता है जब वह जन्मकुण्डली में भी अपनी राशि पर हो तथा नवमांश कुण्डली में भी वह अपनी ही राशि का होकर स्थित हो। दोनों ही कुण्डलियों में ऐसा होने पर वह ग्रह वर्गोत्तमांश ग्रह माना जाएगा ।
महेन्द्र योग वाला जातक जीवन में अत्यन्त उच्च पद पर जा पहुँचता है, इसमें सन्देह नहीं ।
गजपति योग
परिभाषा – (1) लग्न को छोड़कर और किसी भी केन्द्र स्थान (4, 7, 10) में चन्द्रमा गुरु के साथ बैठा हो या अकेला ही पूर्ण बलवान होकर स्थित हो तो गजपति योग होता है ।
(2) गुरु लग्न में हो, बुध केन्द्र स्थान में हो, जो नवमेश या एकादशेश से युक्त हो या दृष्ट हो तो गजपति योग बनता है ।
फल – जिस जातक की कुण्डली में गजपति योग होता है, वह शासक या शासक तुल्य होता है तथा पराक्रमी, धनवान, गुणवान और प्रभावशाली व्यक्तित्व लिए हुए होता है ।
टिप्पणी – गजपति योग भी राज योग की तरह है तथा गजपति योग होने से भी जातक प्रशासकीय अधिकारी बनता है, परन्तु ज्योतिष के विद्यार्थियों, प्रेमियों एवं पाठकों को चाहिए कि वे इन योगों का अध्ययन करते समय सावधानी से काम लें।
राज योग या इस प्रकार के ये अन्य योग उस तथ्य की ओर इंगित करते हैं कि ऐसा योग रखने वाला व्यक्ति ‘राजा’ होता है, परन्तु आज के इम प्रजातांत्रिक युग में ‘राजा’ शब्द का अर्थ परिवर्तित हो चुका है। आज के युग में ‘राजा’ शब्द का अर्थ वही नहीं है, जो प्राचीन काल में था । इस युग में इस प्रकार का योग रखने वाला ऐश्वर्य-सम्पन्न, धनी एवं सुखी होता है।
साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि राज योग में संबंधित ग्रह किस ग्रह से संबंध स्थापित करते हैं। उदाहरणार्थं
- राज योग के ग्रह सूर्य से संबंध स्थापित करते हैं तो वह व्यक्ति राजनीति के क्षेत्र में सफल होता है एवं मंत्री पद प्राप्त करने में समर्थ होता है।
- इसी प्रकार चन्द्रमा से सम्पर्क होने पर वह जातक केन्द्रीय मंत्रिमंडल में सेक्रेटरी या इसी प्रकार का कोई अन्य पद प्राप्त करता है।
- मंगल से संबंध होने पर पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट या कमाण्डर इन चीफ हो जाता है आदि-आदि ।
अतः कुण्डली का अध्ययन सावधानीपूर्वक करना आवश्यक है और सब कुछ विचार करने के पश्चात ही फलाफल निर्देश करना ठीक होता है ।
ऊपर जो गजपति योग निर्दिष्ट किए हैं, क्रमांक 1 में स्पष्ट है कि यदि गुरु और चन्द्र लग्न स्थान को छोड़कर 4, 7, 10वें भाव में हों या अकेला चन्द्र ही 4, 7, 10वें भाव में बलवान होकर स्थित हो तो गजपति योग होता है।
क्रमांक 2 का गजपति योग भी अपने आप में स्पष्ट है। इस योग में यह आवश्यक है कि लग्न भाव में बृहस्पति स्थित हो तथा बुध भी केन्द्र स्थान में ही हो तथा उसके साथ नवम भाव का स्वामी या एकादश भाव का स्वामी अथवा दोनों ही बैठे हों तो पूर्णं गजपति योग बनता है ।
मन्महेन्द्र योग
परिभाषा – (1) जिस जातक की जन्म कुण्डली में शुक्र अपनी शत्रु राशि (4, 5) नीच राशि (6) के अतिरिक्त किसी भी अन्य राशि में स्थित होकर द्वितीय स्थान में हो और लग्नेश बली हो तो मन्महेन्द्र योग होता है ।
(2) जातक का जन्म रात्रि का हो तथा कुण्डली में चन्द्र अपने अधिमित्र का या अपने नवांश में प्राप्त हो एवं उस चन्द्रमा को शुक्र देखता हो तथा अन्य किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो मन्महेन्द्र योग होता है।
(3) मीन लग्न हो तथा मीन के नवांश का होकर शुक्र लग्न में स्थित हो तो मन्महेन्द्र योग होता है ।
(4) लग्नेश अपनी उच्च राशि में स्थित हो तथा उसे चन्द्रमा देखता हो तो भी मन्महेन्द्र योग होता है ।
फल – मन्महेन्द्र योग में उत्पन्न व्यक्ति बलशाली, गुणवान और राज्य-पूज्य होता है तथा उच्च शासकीय पद प्राप्त कर आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करता है ।
टिप्पणी – क्रमांक 1 के मनमहेन्द्र योग में शुक्र को ही मुख्य माना गया है। यों भी शुक्र वाहन, सुख, ऐश्वर्य, भोग-विलास और मनोविनोद सुख का हेतु है और किसी भी जातक की कुण्डली में यह स्वस्थ होकर पड़ा होता है तो यह ग्रह अपने प्रभाव से उपर्युक्त तथ्यों की वृद्धि करता है ।
मन्महेन्द्र योग के लिए यह आवश्यक है कि शुक्र शत्रु राशि का न हो अर्थात् कर्क और सिंह राशि में स्थित न हो और न ही कन्या राशि का हो। इन तीन राशियों को छोड़ वह किसी भी अन्य राशि मेंस्थित होकर दूसरे भाव में बैठा हो और लग्नेश बली हो तो निश्चय ही मन्महेन्द्र योग होता है ।
क्रमांक 2 के योग में यह आवश्यक है कि इस कुण्डली वाले जातक का जन्म रात्रि में हुआ हो तथा चन्द्र अपने अधिमित्र के घर में या स्वयं की नवांश राशि पर स्थित हो तथा इस प्रकार चन्द्र को शुक्र के अतिरिक्त कोई भी ग्रह न देखता हो, (परन्तु शुक्र का देखा जाना आवश्यक है) तो मन्महेन्द्र योग सिद्ध होता है ।
क्रमांक 3 के महेन्द्र योग में मीन लग्न होना आवश्यक है तथा शुक्र भी मीन राशि के नवांश का ही हो तथा कुण्डली में लग्न भाव में बैठा हो तो यह योग बन जाता है ।
क्रमांक 4 का योग स्पष्ट है, इस योग में विशेष बन्धन नहीं है, इसमें आवश्यकता इस बात की है कि जो भी लग्नेश (लग्न भाव का स्वामी) हो, वह कुण्डली में कहीं पर भी हो अपनी उच्च राशि में स्थित हो यथा सूर्य हो तो मेष राशि पर हो, भौम हो तो मकर राशि पर हो गुरु हो तो कर्क राशि पर हो अस्तु, तथा लग्नेश को पूर्ण सातवीं दृष्टि से चन्द्रमा देख रहा हो तो निस्सन्देह मन्महेन्द्र योग सिद्ध होता है।
सुरपति योग
परिभाषा – (1) शनि अपनी उच्च राशि, स्वराशि या मूल त्रिकोण राशि में हो तथा केन्द्र स्थान या त्रिकोण में हो, साथ ही शनि के साथ दशमेश बैठा हो या दशमेश की उस पर दृष्टि हो तो सुरपति योग होता है।
(2) राहुपंचम भाव में तथा चन्द्र-मंगल दूसरे या तीसरे भाव में हों तो सुरपति योग होता है ।
(3) बृहस्पति पंचम भाव में हो तथा चन्द्रमा से केन्द्र स्थान में हो, लग्न भाव स्थिर स्वभाव की राशि का हो तथा लग्नेश दशम भाव में हो तो सुरपति योग होता है ।
(4) चन्द्रमा उच्च राशि का हो या मित्र राशि में बैठा हो, तथा वह नवम भाव में ही हो । लग्न से दशम भाव में शनि और दूसरे भाव में भौम हो तो सुरपति योग होता है ।
फल – सुरपति योग रखने वाला जातक राजा या राजा के तुल्य होता है ।
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